शनिवार, 3 मार्च 2007

एक ही रंग सहस पिचकार

हिन्दुस्तानी सूफ़ी परम्परा में बसन्त उत्सव का महत्व तो हज़रत निज़ामुद्दीन के काल से है। हिन्दुस्तान क्या पाकिस्तान में भी ये परम्परा आज तक क़ायम है। बसन्त के अलावा सूफ़ियाना कलाम में होली का भी एक रूपक की तरह खूब इस्तेमाल हुआ है.. जैसे कि हज़रत शाह नियाज़ का ये कलाम;





होरी होय रही है
अहमद जिया के द्वार
हज़रत अली का रंग बनो है
हसन हुसेन खिलाड़
ऎसो होरी की धूम मची है
चहुँ ओर परी है पुकार
ऎसो अनोखो चतुर खिलाड़ी
रंग दीन्यो संसार
नियाज़ पियाला भर भर छिड़के
एक ही रंग सहस पिचकार

6 टिप्‍पणियां:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

आप को एंव आपके समस्त परिवार को होली की शुभकामना..
आपका आने वाला हर दिन रंगमय, स्वास्थयमय व आन्नदमय हो
होली मुबारक

Divine India ने कहा…

अभय जी,
मैं पहली बार देख रहा हूँ कि "नामानुसार" भी उर्दू
का इतना व्यापक प्रयोग और समझ जो विरले ही
मिलता है…कुछ लोगों के पास ही जो उस कौम से अलग हैं यह धरोहर बचा पायें हैं…।
उम्दा कलाम!!बधाई स्वीकारे!!
होली की शुभकामनाओं के साथ…।

उडन तश्तरी ने कहा…

आपको भी होली की बहुत मुबारकबाद और शुभकामनायें. :)

संजीत त्रिपाठी ने कहा…

होली की रंगारंग शुभकामनाएं

manya ने कहा…

bahut hi saarthak aur saar bhari rachanaa hai.. Happy Holi,,

अतुल ने कहा…

अब कुछ दीवाली पर हो जाए.

अतुल