रविवार, 25 फ़रवरी 2007

कौन हैं रूमी

मौलाना जलालुद्दीन रूमी का जनम ३० सितम्बर १२०७ में ताजिकिस्तान के वख्श नामक स्थान में हुआ था। परिवार मे पहले से ही धार्मिक दार्शनिक संस्कार मौजूद थे। बचपन में ही रूमी को मंगोलो के द्वारा की जाने वाली तबाही से बचने के लिये परिवार समेत भाग कर तब के अनातोलिया और आज के तुर्की के कोन्या मे शरण लेनी पड़ी। २४ की उमर थी जब वालिद साहब का इन्तक़ाल हो गया और आप खुद मौलाना की गद्दी पर आसीन हुये। दीन की महीन और गहरी समझ के चलते आप की शोहरत सब ओर फैल गई।

शम्सुद्दीन तबरेज़ी नाम के एक घुमन्तु दरवेश ने रूमी के ऊपर ऐसा असर छोड़ा, ऐसा रासायनिक परिवर्तन किया कि ये दुनियादारी छोड़ के सूफ़ी हो गये। दुनिया इन्होने ज़रूर छोड़ दी पर दीन नहीं छोड़ा बहुत हाल तक क़ुरान को अरबी मे ही पढ़ने की रवायत थी.. तो कहा जाता है कि जो लोग किन्ही वजहों से अरबी नहीं सीख सकते थे.. तो उन्हे मौलाना रचित मसनवी पढ़ने की सलाह दी जाती थी और मसनवी को फ़ारसी की क़ुरान माना जाता था। मसनवी मे महापुरुषों के संस्मरणों व अन्य रूपकों के ज़रिये ईश्वर और आस्था के मसलों पर विवेचन है। मसनवी के अलावा दूसरी महत्वपूर्ण रचना है - दीवान-ए-शम्स तबरेज़ी। इस पूरे दीवान मे एक दफ़े भी आपको रूमी का नाम पढ़ने को नहीं मिलेगा। मक़ते में शायर के नाम के स्थान पर शम्स का ही नाम आता है..जिनके विरह मे और शौक़ में ये सारी ग़ज़लें उनसे हो कर बहीं। एक तीसरी रचना भी है- फ़ीही मा फ़ीही - जो रूमी के शिष्यों के साथ उनका आध्यात्मिक वार्तालाप है।

१७ दिसम्बर १२७३ को आपने पार्थिव शरीर छोड़ दिया।
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मज़हब के दायरे होते हैं... पर आस्था सार्वभौमिक है... रूमी को इसी नज़र से देखने की विनती है मेरी।

4 टिप्‍पणियां:

उडन तश्तरी ने कहा…

स्वागत है!!

बेनामी ने कहा…

यह एक अच्छी कोशिश हो रही है। रवीश कुमार
naisadak.blogspot.com

अनूप शुक्ला ने कहा…

बहुत खूब! एक और कनपुरिये को नेट पर देखकर जी जुड़ा गया! अपन पता-ठिकाना बताऒ भैये!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

मज़हब के दायरे होते हैं... पर आस्था सार्वभौमिक है...

जलालुद्दीन रूमी के बारे में कुछ खोजते हुये यहां तक आना हुआ, लाजवाब बात कही है आपने. आगे पढके देखते हैं. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम