गुरुवार, 1 मार्च 2007

पूछते, है इश्क क्या?


वो रूह क्या इश्क जिसकी तबीयत नही।
ना होती तो अच्छा था, होना ग़ैरत नही॥

मस्त रह इश्क में, जो कुछ है इश्क है।
इश्क के ब्योपार बिन, यार का रस्ता नही॥

पूछते, है इश्क क्या, कह खुदी को छोड़ना।
खुद को जीता न हो, तो खुदी कोई नही॥

शाह वो आशिक, आलम दो निसार उस पे।
है ऐसा शाह वो, उनपे नज़र करता नही॥

होगा आशिक सदा और रहेगा इश्क बाकी।
न रख दिल में सिवा इसके, जो मांगा नही॥

लोगे लाश दिलबर की कब तलक आगोश मे।
उस रूह के आगोश में क्यों कोई गिरता नही॥

जन्मा जो बहारो मे, बिखर जाएगा पतझड़ तक।
इश्क के गुलज़ार को, मौसम कोई चहिए नही॥

बहारो मे फूल के साथी तीखे शूल होते है।
सर से उतरे पीर न हो, मय कोई ऐसी नही॥

ठहरकर राह पर इस, बोलता क्या जोहता क्या।
कटे जो इन्तज़ारी में, मौत कोई ऎसी नही॥

साथ सच्चे का पकड़, खोटा नही सिक्का अग़र।
इस मरम पे कान दे, कान जो कच्चा नही॥

तन के घोड़े पे लरजना, छोड़ औ ले राह पैदल।
पर बख्शेगा खुदा उसको, तन पे जो चढता नही॥

फिकर दिल से विदा कर, चकाचक साफ कर ले।
आइने जैसा कोई मोहरा नही चेहरा नहीं॥

वो चेहरे सब दिखाता, उसका नही चेहरा कोई।
सादगी उसकी, किसी चेहरे पे शरमाता नही॥

बिदाई ऐब से चहिये तो उसकी ओर देखो।
सच्ची बात कहने मे कभी घबराता नही॥

मुरदा आइने में मिला सफाई का हुनर ऐसा।
उस दिल का होगा क्या जिस पे ग़रद छाता नही॥

बता दूँ मिलेगा क्या? मगर न चुप ही रहूँगा।
बोले कहीं महबूब ना राज़दां मैं अच्छा नही॥

2 टिप्‍पणियां:

उन्मुक्त ने कहा…

चिट्ठे की साज सज्जा और चित्र सुन्दर हैं।

SHUAIB ने कहा…

आख़िर ये इश्क़ क्या बला है ?

आपको होली की शुभकामनाएं